भारत का मौसम (Indian Climate) – संपूर्ण नोट्स
प्रस्तावना
भारत की भौगोलिक स्थिति, विशाल क्षेत्रफल, पर्वतों, समुद्रों, पठारों, मैदानों और रेगिस्तानी क्षेत्रों के कारण यहाँ मौसम और जलवायु में बहुत अधिक विविधता पाई जाती है। भारत में एक ही समय में अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग प्रकार का मौसम देखने को मिल सकता है। कहीं अत्यधिक गर्मी पड़ती है, तो कहीं बर्फबारी होती है। राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों में गर्म और शुष्क मौसम पाया जाता है, जबकि हिमालयी क्षेत्रों में सर्दियों के दौरान तापमान बहुत कम हो जाता है। दक्षिण भारत के तटीय क्षेत्रों में समुद्र के प्रभाव के कारण तापमान में अपेक्षाकृत कम उतार-चढ़ाव होता है। भारत की जलवायु को मुख्य रूप से मानसूनी जलवायु कहा जाता है, क्योंकि यहाँ वर्षा का अधिकांश भाग दक्षिण-पश्चिम मानसून से प्राप्त होता है।
भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक
भारत के मौसम और जलवायु को कई भौगोलिक एवं वायुमंडलीय कारक प्रभावित करते हैं। इनमें अक्षांशीय स्थिति, समुद्र तल से ऊँचाई, हिमालय पर्वत, समुद्र से दूरी, स्थलाकृति, वायुदाब तथा पवनों की दिशा प्रमुख हैं।
भारत का एक बड़ा भाग उष्ण कटिबंध में स्थित है, इसलिए देश के अधिकांश हिस्सों में वर्ष के काफी समय तक तापमान ऊँचा रहता है। वहीं हिमालय की ऊँची पर्वत श्रेणियाँ उत्तर से आने वाली अत्यधिक ठंडी हवाओं को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। हिमालय मानसूनी हवाओं को रोककर उन्हें ऊपर उठने के लिए मजबूर करता है, जिससे भारत के अनेक भागों में वर्षा होती है।
भारत के दक्षिण में हिंद महासागर, पश्चिम में अरब सागर और पूर्व में बंगाल की खाड़ी स्थित हैं। इन समुद्री क्षेत्रों का भारतीय जलवायु पर गहरा प्रभाव पड़ता है। समुद्र के निकट स्थित क्षेत्रों में तापमान अपेक्षाकृत संतुलित रहता है, जबकि समुद्र से दूर स्थित आंतरिक क्षेत्रों में गर्मी और सर्दी का अंतर अधिक पाया जाता है।
भारत में मौसम की प्रमुख ऋतुएँ
भारतीय मौसम विज्ञान में वर्ष को मुख्य रूप से चार प्रमुख ऋतुओं में बाँटा जाता है—
- शीत ऋतु
- ग्रीष्म ऋतु
- दक्षिण-पश्चिम मानसून ऋतु
- मानसून की वापसी या उत्तर-पूर्वी मानसून ऋतु
इन ऋतुओं का स्वरूप पूरे भारत में एक जैसा नहीं होता, लेकिन इनके आधार पर भारतीय जलवायु को समझना आसान होता है।
1. शीत ऋतु
भारत में सामान्यतः दिसंबर से फरवरी तक शीत ऋतु का प्रभाव रहता है। दिसंबर और जनवरी में उत्तरी भारत के कई क्षेत्रों में तापमान काफी कम हो जाता है। हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी होती है, जबकि मैदानी क्षेत्रों में ठंड, कोहरा और कभी-कभी शीत लहर की स्थिति उत्पन्न होती है।
उत्तर-पश्चिम भारत में इस समय पश्चिमी विक्षोभ के कारण वर्षा होती है। यह वर्षा गेहूँ जैसी रबी फसलों के लिए बहुत उपयोगी होती है। हिमालयी क्षेत्रों में पश्चिमी विक्षोभ के कारण बर्फबारी भी होती है।
दक्षिण भारत में शीत ऋतु अपेक्षाकृत हल्की होती है। इसका मुख्य कारण समुद्र का प्रभाव है। तटीय क्षेत्रों में तापमान बहुत अधिक नीचे नहीं जाता।
2. ग्रीष्म ऋतु
मार्च से मई तक भारत के अधिकांश हिस्सों में गर्मी बढ़ने लगती है। अप्रैल और मई में तापमान कई क्षेत्रों में बहुत अधिक हो जाता है। विशेष रूप से उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत में गर्मी का प्रभाव अत्यधिक रहता है।
मई के महीने में राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार के कई हिस्सों में तापमान काफी ऊँचा हो सकता है। इस दौरान उत्तर-पश्चिम भारत में गर्म और शुष्क हवाएँ चलती हैं, जिन्हें सामान्यतः लू कहा जाता है। लू स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकती है और इससे बचाव आवश्यक होता है।
गर्मियों के दौरान भारत के कुछ क्षेत्रों में स्थानीय तूफान और वर्षा भी होती है। पश्चिम बंगाल और असम में आने वाले तेज तूफानों को स्थानीय रूप से कालबैसाखी कहा जाता है। दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में भी गर्मी के मौसम में गरज के साथ वर्षा होती है।
3. दक्षिण-पश्चिम मानसून ऋतु
भारत में वर्षा ऋतु का सबसे महत्वपूर्ण चरण दक्षिण-पश्चिम मानसून है। सामान्यतः जून के आसपास मानसूनी हवाएँ भारत में प्रवेश करना शुरू करती हैं। ये हवाएँ मुख्य रूप से हिंद महासागर से नमी लेकर आती हैं और देश के बड़े हिस्से में वर्षा करती हैं।
दक्षिण-पश्चिम मानसून की दो प्रमुख शाखाएँ मानी जाती हैं—
अरब सागर शाखा और बंगाल की खाड़ी शाखा।
अरब सागर शाखा पश्चिमी तट और पश्चिमी घाट के क्षेत्रों में भारी वर्षा कराती है। दूसरी ओर बंगाल की खाड़ी शाखा पूर्वोत्तर भारत और गंगा के मैदानों की ओर बढ़ती है तथा अनेक क्षेत्रों में वर्षा करती है।
भारत में मानसून का आगमन कृषि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। देश की बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर रही है और वर्षा का कृषि उत्पादन पर सीधा प्रभाव पड़ता है। मानसून अच्छा होने पर फसलों के उत्पादन में वृद्धि हो सकती है, जबकि मानसून कमजोर या अनियमित होने पर सूखे जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
4. मानसून की वापसी
सितंबर के बाद दक्षिण-पश्चिम मानसून धीरे-धीरे भारत के उत्तरी और पश्चिमी हिस्सों से वापस लौटने लगता है। इसे मानसून की वापसी या उत्तर-पूर्वी मानसून का समय कहा जाता है।
इस दौरान हवाओं की दिशा में परिवर्तन होने लगता है। दक्षिण भारत के विशेषकर तमिलनाडु और आसपास के क्षेत्रों में उत्तर-पूर्वी मानसून से महत्वपूर्ण वर्षा होती है। तमिलनाडु की वार्षिक वर्षा में इस मानसून का विशेष योगदान है।
भारत में वर्षा का वितरण
भारत में वर्षा का वितरण समान नहीं है। कुछ क्षेत्रों में बहुत अधिक वर्षा होती है, जबकि कुछ क्षेत्र बहुत कम वर्षा प्राप्त करते हैं।
पूर्वोत्तर भारत और पश्चिमी तट के कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा होती है। इसके विपरीत राजस्थान के पश्चिमी भाग, लद्दाख तथा कुछ आंतरिक क्षेत्रों में वर्षा बहुत कम होती है।
भारत में अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में मेघालय और पश्चिमी घाट के कुछ क्षेत्र प्रमुख हैं। मेघालय का मौसिनराम और आसपास का क्षेत्र अत्यधिक वर्षा के लिए प्रसिद्ध है। दूसरी ओर पश्चिमी राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्र कम वर्षा प्राप्त करते हैं।
मानसून का महत्व
भारत की अर्थव्यवस्था और कृषि के लिए मानसून का बहुत बड़ा महत्व है। वर्षा से कृषि भूमि को पानी मिलता है, नदियों और जलाशयों में जल की मात्रा बढ़ती है तथा भूजल के पुनर्भरण में सहायता मिलती है। सिंचाई, पेयजल, जलविद्युत उत्पादन और अनेक आर्थिक गतिविधियाँ भी वर्षा पर निर्भर करती हैं।
भारत में मानसून केवल वर्षा का मौसम नहीं है, बल्कि यह देश की कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण आधार है। मानसून में देरी, अत्यधिक वर्षा या वर्षा की कमी का फसलों और किसानों पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है।
भारतीय मानसून की विशेषताएँ
भारतीय मानसून की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी अनिश्चितता और परिवर्तनशीलता है। मानसून हर वर्ष एक समान नहीं रहता। किसी वर्ष वर्षा सामान्य से अधिक हो सकती है, जबकि किसी अन्य वर्ष कुछ क्षेत्रों में वर्षा कम हो सकती है।
मानसून की दूसरी विशेषता इसका अचानक सक्रिय होना है। मानसून के आगमन के साथ कई क्षेत्रों में अचानक भारी वर्षा होने लगती है। इसे मानसून का फटना या Monsoon Burst कहा जाता है।
मानसून के दौरान वर्षा लगातार नहीं होती रहती। कई बार कुछ दिनों तक वर्षा होने के बाद कुछ समय के लिए वर्षा रुक जाती है। इस स्थिति को मानसून का विराम (Break in Monsoon) कहा जाता है।
भारत में स्थानीय मौसम की घटनाएँ
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में कई स्थानीय मौसम संबंधी घटनाएँ देखने को मिलती हैं। उत्तर भारत में गर्मियों के दौरान लू चलती है। पश्चिम बंगाल और असम में कालबैसाखी जैसे तूफान आते हैं। केरल और कर्नाटक में गर्मियों की वर्षा को कुछ स्थानों पर आम की बौछारों से जोड़ा जाता है, क्योंकि इससे आम की फसल को लाभ मिलता है।
हिमालयी क्षेत्रों में सर्दियों के दौरान बर्फबारी होती है। उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में सर्दियों में कोहरा सामान्य मौसमीय घटना है। तटीय क्षेत्रों में समुद्री हवाओं के कारण तापमान अपेक्षाकृत संतुलित रहता है।
भारत के मौसम में विविधता
भारत की जलवायु में क्षेत्रीय विविधता बहुत अधिक है। उदाहरण के लिए, गर्मियों में राजस्थान का तापमान बहुत अधिक हो सकता है, जबकि उसी समय हिमालयी क्षेत्रों में मौसम काफी ठंडा रहता है। इसी प्रकार, पूर्वोत्तर भारत में भारी वर्षा हो सकती है, जबकि राजस्थान के पश्चिमी हिस्से में बहुत कम वर्षा होती है।
दक्षिण भारत में समुद्र के प्रभाव के कारण तापमान में दैनिक और वार्षिक अंतर अपेक्षाकृत कम होता है। इसके विपरीत उत्तर भारत के आंतरिक क्षेत्रों में गर्मी और सर्दी के तापमान में काफी अंतर देखने को मिलता है।
मौसम और कृषि
भारतीय कृषि पर मौसम का बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। खरीफ फसलों की खेती मुख्य रूप से मानसून की वर्षा पर निर्भर करती है। धान, मक्का, कपास, सोयाबीन और कई अन्य फसलें वर्षा ऋतु में उगाई जाती हैं।
रबी फसलों की बुवाई मुख्यतः मानसून के बाद होती है। गेहूँ, चना, सरसों और जौ प्रमुख रबी फसलें हैं। सर्दियों का तापमान और पश्चिमी विक्षोभ से होने वाली वर्षा इन फसलों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।
मौसम और मानव जीवन
भारत का मौसम लोगों के दैनिक जीवन को भी प्रभावित करता है। गर्मियों में लोग हल्के कपड़े पहनते हैं और गर्मी से बचने के लिए पानी तथा ठंडे पेय पदार्थों का अधिक उपयोग करते हैं। सर्दियों में गर्म कपड़ों की आवश्यकता होती है। मानसून के दौरान बाढ़, जलभराव और यातायात संबंधी समस्याएँ कई क्षेत्रों में देखने को मिल सकती हैं।
मौसम का प्रभाव पर्यटन, परिवहन, उद्योग, ऊर्जा की मांग और स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। अत्यधिक गर्मी, ठंड, बाढ़ और सूखा जैसी मौसमी परिस्थितियाँ जनजीवन को प्रभावित कर सकती हैं।
जलवायु परिवर्तन और भारत का मौसम
हाल के दशकों में जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम की चरम घटनाओं को लेकर चिंता बढ़ी है। तापमान में वृद्धि, अत्यधिक गर्मी, अनियमित वर्षा, अचानक भारी बारिश, सूखा और समुद्र के स्तर में वृद्धि जैसी घटनाएँ भारत के विभिन्न क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण चुनौतियाँ हैं।
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कृषि, जल संसाधनों, स्वास्थ्य, वन्यजीव और तटीय क्षेत्रों पर पड़ सकता है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण, वृक्षारोपण, स्वच्छ ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग पर ध्यान देना आवश्यक है।
निष्कर्ष
भारत का मौसम अत्यंत विविध और जटिल है। इसकी सबसे प्रमुख विशेषता मानसूनी जलवायु है, लेकिन देश के अलग-अलग भागों में भौगोलिक परिस्थितियों के कारण मौसम का स्वरूप अलग-अलग दिखाई देता है। हिमालय, समुद्र, अक्षांश, ऊँचाई, स्थलाकृति और पवनों की दिशा भारत के मौसम को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं। भारतीय कृषि, अर्थव्यवस्था और जनजीवन मानसून से गहराई से जुड़े हुए हैं। इसलिए भारत के मौसम और मानसून का अध्ययन केवल भूगोल की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि कृषि, अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और समाज की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

